Sunday, September 22, 2013

भरम


भरम

ज़माने का पानी सज़ा पा रहा है,
समन्दर को देखो मज़ा आ रहा है.

जो मीठे थे चश्मे खतम हो रहे हैं,
जो बच भी गये तो सितम हो रहे हैं.
ये मजमा शराफत को ठुकरा रहा है,
समन्दर को देखो मज़ा आ रहा है.

दिलों के उजाले अंधेरों में बदले,
साधू यहाँ जब लुटेरों में बदले.
गुनाहों का बादल तो अब छा रहा है,
समन्दर को देखो मज़ा आ रहा है.

जो कल तक बताते थे रस्ते जहां के,
वो तो नहीं भटके आकार यहाँ पे.
तुम्ही को तुम्ही में फंसाता रहा है,
समन्दर को देखो मज़ा आ रहा है.

दहशत अंधेरों को ही ढो रही है,
असल में सियासत यही हो रही है.
वतन इनके हाँथों ठगा जा रहा है,
समन्दर को देखो मज़ा आ रहा है.
  
गुलाबों पे झगड़ा मशालों पे झगड़ा,
किताबों पे झगड़ा रिसालों पे झगड़ा.
अमन को भरम ही तो अब खा रहा है,
समन्दर को देखो मज़ा आ रहा है.

ज़माने का पानी सज़ा पा रहा है,
समन्दर को देखो मज़ा आ रहा है.

© सुशील मिश्र.
   22/09/2013

चश्मा = तालाब/पोखर,  रिसालों = सरकारी कर (Tax)
















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