Wednesday, April 16, 2014

सोच


सोच

कभी इसके उसके सफ़र पे रंज करने को,
जो सीधा रास्ता पकड़े उसी को तंग करने को.
हिफाज़त जो वतन की करना चाहे इस बवंडर से,
खड़े तुम हो गए हो फिर उसी पे तंज़ करने को.

वो देखो आसमाँ में तुमको नहीं रस्ता दिखेगा पर,
पंछी ढूढ़ लेते आशियाँ उन्ही रस्तों पे चल करके.
सियासत क्या तुम्हारी है हमें भी तो बता दो यार,
कि खिलाफत ही करोगे बस चमन बदरंग करने को.

वो देखो एक नया सूरज उगने को तैय्यार बैठा है,
सिकन्दर भी समय से मान अपनी हार बैठा है.
ज़हन की खिड़कियाँ खोलने को तैय्यार जो तुम हो,
तुम्हे भी साथ लेंगे हम समय के संग चलने को.

© सुशील मिश्र.

  16/04/2014

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