Thursday, May 15, 2014

ऐसा क्यों इंसान है


ऐसा क्यों इंसान है


एक चहरे पे कई चहरे,
ऐसा तो इंसान है,
फितरत जिसकी गिरगिट जैसी,
ऐसा क्यों इंसान है.

कल तक था जो खिला खिला सा,
खुशबू बांटा करता था.
आज नज़रिया उसका बदला,
ऐसा क्यों इंसान है.

सीधा सादा हिम्मतवाला,
सच जिसकी हर बातों में था.
वही झूठ का बना खिलाड़ी,
ऐसा क्यों इंसान है.

दिल का दर्द जुबां पे जिसके,
हमने सुना नहीं था अब तक.
अब लोगों के राज़ बेचता,
ऐसा क्यों इंसान है.

एक चहरे पे कई चहरे,
ऐसा तो इंसान है,
फितरत जिसकी गिरगिट जैसी,
ऐसा क्यों इंसान है.

© सुशील मिश्र.

15/04/2014

Friday, April 25, 2014

सही रास्ता


सही रास्ता

नदी ही समन्दर का है रास्ता,
हवा ही बवंडर का है रास्ता.
खिलाफत पे दुनिया उतारू अगर है,
समझ लो मुकद्दस है ये रास्ता.

बढ़े जा अकेले जो अच्छा है दिल से,
वही तूफां झेले जो सच्चा है दिल से.
यही रीत है, और दस्तूर भी है,
बेख़ौफ़ नज़रें मिलाये जो कातिल से.

है छोटा बहुत पर असर भी बहुत है,
मदद की न दरकार उसको फ़कत है.
चमकता है जो खुद की रोशनी से,
जुगनू को लाज़िम ना कोई मदद है.

अन्धेरा जिसे देखकर भागता है,
सवेरा जिसे देखकर जागता है.
है उम्मीद की वो ऐसी ललक,
की सूरज भी जिससे किरण मांगता है.

मोहब्बत का बदला मोहब्बत से जो दे,
अदावत का बदला अदावत से जो दे.
वतन को ज़रुरत है ऐसे जिगर की,
हूकूमत का बदला हूकूमत से जो दे.

नदी ही समन्दर का है रास्ता,
हवा ही बवंडर का है रास्ता.
खिलाफत पे दुनिया उतारू अगर है,
समझ लो मुकद्दस है ये रास्ता.


© सुशील मिश्र.

25/04/2014

Wednesday, April 16, 2014

सोच


सोच

कभी इसके उसके सफ़र पे रंज करने को,
जो सीधा रास्ता पकड़े उसी को तंग करने को.
हिफाज़त जो वतन की करना चाहे इस बवंडर से,
खड़े तुम हो गए हो फिर उसी पे तंज़ करने को.

वो देखो आसमाँ में तुमको नहीं रस्ता दिखेगा पर,
पंछी ढूढ़ लेते आशियाँ उन्ही रस्तों पे चल करके.
सियासत क्या तुम्हारी है हमें भी तो बता दो यार,
कि खिलाफत ही करोगे बस चमन बदरंग करने को.

वो देखो एक नया सूरज उगने को तैय्यार बैठा है,
सिकन्दर भी समय से मान अपनी हार बैठा है.
ज़हन की खिड़कियाँ खोलने को तैय्यार जो तुम हो,
तुम्हे भी साथ लेंगे हम समय के संग चलने को.

© सुशील मिश्र.

  16/04/2014

Wednesday, March 12, 2014

आत्मबल

आत्मबल

जो सितारा मिला नहीं तुम्हें,
मत सोचो कि तुम उसके काबिल नहीं.
ज़हीन और मकबूल तुम कितने हो,
वो सितारा इस बात से वाकिफ़ नहीं.

तुम चले थे दुनिया के बनाए रस्ते पर,
इसीलिए वे तुम्हारी किस्मत न भांप सके.
और संभवतः यही कारण रहा होगा,
के वे तुम्हे ठीक से ना आँक सके.

इसमें उन राहों की कोई गलती नहीं,
और उन निगाहों की भी कोई गलती नहीं.
क्योंकी उन्होंने सीखा था सिर्फ ऊपर से देखना,
अतः वे तुम्हारे अंदर न झाँक सके.

पर घबराना मत और कभी पछताना भी मत,
इरादों को करो हिमालय, ताकि वे कभी न झुक सकें.
बनाओ नये रास्ते अपने,
जिनपे कल दूसरे भी चल सकें.

समन्दर में कितनी ही बूँदें गिरती हैं,
मौसम या बेमौसम के बारिशों की.
कुछ तो सीप में पड़ के आफताब हुए,
और कुछ नज्र हुए किस्मत के साजिशों की.

जैसे कि हवा, पानी और रूहानियत,
को इस जहां में कोई तोल नहीं सकता.
वैसे ही हिम्मत, माद्दे, जज़्बे और संस्कारों,
का इस इस कायनात में कोई मोल नहीं हो सकता.

जो बंद हुआ कल, उसे सिर्फ रोशनदान मानो,
क्योंकी आगे अनेक दरवाजे राह में हैं तुम्हारे.
जिससे चूक गये उसे सिर्फ एक पड़ाव मानो,
क्योंकी मंजिलें इंतज़ार में हैं तुम्हारे.

खुद पे हैसला और ईश्वर पे यकीन,
बस यही मनुज का संबल है.
आँधियों से डर के बैठ जाते हैं लोग अक्सर,
पर उसमें भी जो दिया जलाए वही आत्मबल है.

© सुशील मिश्र.

11/03/2014

Thursday, February 6, 2014

सच

सच

नगरी नगरी द्वारे द्वारे कूल किनारे नहीं मिला,
धरती की क्या बात है प्यारे अम्बर में भी नहीं मिला.
मन के अंदर बैठा है जो, उसको बाहर ढूढ़ रहे,
फिर कहते हो फल मेहनत का मुझको क्योंकर नहीं मिला.

अहं मनुज का बहुत बड़ा है खुद के छोटे ज्ञान पर,
तर्क कुतर्क बहुत करता है सदियों के विज्ञान पर.
खुद की गलती से न सीखे और फिर से उसको दोहराए,
बहुत बड़ा बट्टा रखता वो, खुद के ही सम्मान पर.

सारे प्रश्न उसी से क्यों हैं जो सच का अनुगामी है,
इसी आड़ में बच जाता है जो सच में खल कामी हैं.
संभल संभल कर नहीं चले तो, फिर पीछे पछताओगे,
कुटिल सियासत अक्सर देती सच्चे को बदनामी है.

ज्ञान बांटना बहुत सरल है मगर सीखना मुश्किल है,
अपना सबकुछ यहाँ लुटाकर जगत जीतना मुश्किल है.
इस मायावी दुनिया में रहकर इतना तो जान लिया,
दीप जलाना बहुत सरल है जलते रहना मुश्किल है.

© सुशील मिश्र
  06/02/2014



Tuesday, February 4, 2014

माँ शारदे

माँ शारदे

माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे,
बुद्धी कला विज्ञान का वरदान दे माँ शारदे.
माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे, माँ शारदे,
संगीत सा सुरभित रहूँ वह ज्ञान दे माँ शारदे. llमाँ शारदेll

चहुँ ओर काली रात है अज्ञान का विस्तार है,
संहार की इस मानसिकता का बड़ा ही भार है.
काली घटा को छांट कर तू ज्ञान का आकार दे,
संस्कृति सदा उन्नत रहे इसको नया विस्तार दे. llमाँ शारदेll

राज ही अब नीतियों को क्यों रहा दुत्कार है,
मीठे वचन आतुर नयन का क्यों नहीं विस्तार है.
इस राजनीति को नया अब नीतियों का सार दे,
उल्लसित संसार दे अब उल्लसित संसार दे. llमाँ शारदेll

लोकतंत्र में यहाँ अब तंत्र का ही लोप है,
भ्रष्टता और निम्नता का हो रहा विस्फोट है.
दीन जन का हित सधे वो तंत्र दे माँ शारदे,
राष्ट्र उन्नति कर सके वो मंत्र दे माँ शारदे. llमाँ शारदेll

© सुशील मिश्र
04/02/1014

    (वसंत पंचमी )

Tuesday, January 21, 2014

दिल्ली दरबार


दिल्ली दरबार

नेता जनता का हित साधे ये ही रीत पुरानी है,
शासक वही, प्रजा जनों का, जो हर भांति हितकामी है.
लेकिन जब शासक खुद ही सड़कों पर नाटक दिखा रहा,
जनता ऐसा शासक झेले उसकी ये नादानी है.

जनता जब विचलित होती है शासन की बेईमानी से,
धरने, अनशन आंदोलन वो करती है कुर्बानी से.
पर अब तो दिल्ली में देखो, ये उल्टी गंगा बहा रहे,
शासन बैठ गया अनशन पे अपनी ही मनमानी से.

बात बात पे शासन रूठे अब ये कारस्तानी है,
प्यादे से शासक की लड़ाई अब दिल्ली की यही कहानी है.
मंत्री नेता बात बात पे जब धरने की धमकी देते हों,
दायित्वों से पीछे हटने की साक्षात निशानी है.

© सुशील मिश्र.

  21/01/2014