Thursday, July 3, 2014

फ़लसफ़ा

फ़लसफ़ा


सफ़र मुश्किल तो होता है, मगर हिम्मत भी देता है.
दिलों में हो अगर जज़्बा, तो ये जन्नत ही देता है.

एक तो अँधेरी हैं ये रातें, और मंजिल भी पहेली है.
इसमें भी जो तू हौसला कर ले, तो वो इनायत ही देता है.

दिन-रात, अँधेरे-उजाले, सिखाते रहे ज़िंदगी का फलसफा.
इबादत के सफ़र में, साथ भी मोहब्बत ही देता है.

बुजुर्गों की दुआएं, जो समेटे अपने दामन में.
खुदा का नूर एहसासों में ढलकर, उन्हें रहमत ही देता है.

दरख्तों को ज़रा देखो, या फिर तुम दरिया को ही देखो.
हज़ारों ज़ुल्म सहकर भी, हमें जीवन ही देता है.

सफ़र मुश्किल तो होता है, मगर हिम्मत भी देता है.
दिलों में हो अगर जज़्बा, तो ये जन्नत ही देता है.

© सुशील मिश्र.
   03/07/2014







Sunday, June 15, 2014

माँ- बाप

माँ- बाप

बवंडर कितने भी हों खूंखार,
वो उनको मोड़ जाते हैं.
तपिश सूरज की खुद सह कर,
शीतल हवाएँ छोड़ जाते हैं.

दिलों में दफ़न कर के,
ज़िंदगी भर के अरमान.
वो सिर्फ हमारे लिए,
खुला आकाश छोड़ जाते हैं.

हमारी गलतियों पे भी सदा,
जो दुनिया के ताने झेल जाते हैं.
ज़माने के तंज़ सुनकर भी,
प्यार और मोहब्बत छोड़ जाते हैं.

हमने कितनी ही गुस्ताखियों से उनका,
दिल दुखाया हो भले लेकिन.
ये माँ-बाप ही हैं जो,
चोट सह कर भी दुआएं छोड़ जाते हैं.

© सुशील मिश्र.

  15/06/2014

Sunday, May 25, 2014

चेहरा

चेहरा

एक चेहरे पे कितने चेहरे लिए,
आज देखो यहाँ घूमता आदमी.
मुस्कराहट लबों पे भी नकली लिए,
अब तो अपना बना कर छले आदमी.

जब थे मतलब के दिन वो तुम्हारा रहा,
तुम समन्दर थे जब वो किनारा रहा.
आज पानी तुम्हारा जो कम हो गया,
वो किनारा भी अब ना सहारा रहा.

एक चमकता सितारा थे जब तुम कभी,
ये चमकती फिजायें भी थीं साथ में.
रौशनी की ज़रा सी कमी क्या हुई,
एक दिया तक नहीं है तो अब पास में.

मतलबी क्यूं बना इतना इंसान अब,
आदमी क्यों बना है जी शैतान अब.
मन में झांकें तो पायेंगे बस बात ये,
दिन को दिन कह दिया था भरी रात में.

एक चेहरे पे कितने चेहरे लिए,
आज देखो यहाँ घूमता आदमी.
मुस्कराहट लबों पे भी नकली लिए,
अब तो अपना बना कर छले आदमी.

© सुशील मिश्र.

  25/05/2014

Thursday, May 15, 2014

ऐसा क्यों इंसान है


ऐसा क्यों इंसान है


एक चहरे पे कई चहरे,
ऐसा तो इंसान है,
फितरत जिसकी गिरगिट जैसी,
ऐसा क्यों इंसान है.

कल तक था जो खिला खिला सा,
खुशबू बांटा करता था.
आज नज़रिया उसका बदला,
ऐसा क्यों इंसान है.

सीधा सादा हिम्मतवाला,
सच जिसकी हर बातों में था.
वही झूठ का बना खिलाड़ी,
ऐसा क्यों इंसान है.

दिल का दर्द जुबां पे जिसके,
हमने सुना नहीं था अब तक.
अब लोगों के राज़ बेचता,
ऐसा क्यों इंसान है.

एक चहरे पे कई चहरे,
ऐसा तो इंसान है,
फितरत जिसकी गिरगिट जैसी,
ऐसा क्यों इंसान है.

© सुशील मिश्र.

15/04/2014

Friday, April 25, 2014

सही रास्ता


सही रास्ता

नदी ही समन्दर का है रास्ता,
हवा ही बवंडर का है रास्ता.
खिलाफत पे दुनिया उतारू अगर है,
समझ लो मुकद्दस है ये रास्ता.

बढ़े जा अकेले जो अच्छा है दिल से,
वही तूफां झेले जो सच्चा है दिल से.
यही रीत है, और दस्तूर भी है,
बेख़ौफ़ नज़रें मिलाये जो कातिल से.

है छोटा बहुत पर असर भी बहुत है,
मदद की न दरकार उसको फ़कत है.
चमकता है जो खुद की रोशनी से,
जुगनू को लाज़िम ना कोई मदद है.

अन्धेरा जिसे देखकर भागता है,
सवेरा जिसे देखकर जागता है.
है उम्मीद की वो ऐसी ललक,
की सूरज भी जिससे किरण मांगता है.

मोहब्बत का बदला मोहब्बत से जो दे,
अदावत का बदला अदावत से जो दे.
वतन को ज़रुरत है ऐसे जिगर की,
हूकूमत का बदला हूकूमत से जो दे.

नदी ही समन्दर का है रास्ता,
हवा ही बवंडर का है रास्ता.
खिलाफत पे दुनिया उतारू अगर है,
समझ लो मुकद्दस है ये रास्ता.


© सुशील मिश्र.

25/04/2014

Wednesday, April 16, 2014

सोच


सोच

कभी इसके उसके सफ़र पे रंज करने को,
जो सीधा रास्ता पकड़े उसी को तंग करने को.
हिफाज़त जो वतन की करना चाहे इस बवंडर से,
खड़े तुम हो गए हो फिर उसी पे तंज़ करने को.

वो देखो आसमाँ में तुमको नहीं रस्ता दिखेगा पर,
पंछी ढूढ़ लेते आशियाँ उन्ही रस्तों पे चल करके.
सियासत क्या तुम्हारी है हमें भी तो बता दो यार,
कि खिलाफत ही करोगे बस चमन बदरंग करने को.

वो देखो एक नया सूरज उगने को तैय्यार बैठा है,
सिकन्दर भी समय से मान अपनी हार बैठा है.
ज़हन की खिड़कियाँ खोलने को तैय्यार जो तुम हो,
तुम्हे भी साथ लेंगे हम समय के संग चलने को.

© सुशील मिश्र.

  16/04/2014

Wednesday, March 12, 2014

आत्मबल

आत्मबल

जो सितारा मिला नहीं तुम्हें,
मत सोचो कि तुम उसके काबिल नहीं.
ज़हीन और मकबूल तुम कितने हो,
वो सितारा इस बात से वाकिफ़ नहीं.

तुम चले थे दुनिया के बनाए रस्ते पर,
इसीलिए वे तुम्हारी किस्मत न भांप सके.
और संभवतः यही कारण रहा होगा,
के वे तुम्हे ठीक से ना आँक सके.

इसमें उन राहों की कोई गलती नहीं,
और उन निगाहों की भी कोई गलती नहीं.
क्योंकी उन्होंने सीखा था सिर्फ ऊपर से देखना,
अतः वे तुम्हारे अंदर न झाँक सके.

पर घबराना मत और कभी पछताना भी मत,
इरादों को करो हिमालय, ताकि वे कभी न झुक सकें.
बनाओ नये रास्ते अपने,
जिनपे कल दूसरे भी चल सकें.

समन्दर में कितनी ही बूँदें गिरती हैं,
मौसम या बेमौसम के बारिशों की.
कुछ तो सीप में पड़ के आफताब हुए,
और कुछ नज्र हुए किस्मत के साजिशों की.

जैसे कि हवा, पानी और रूहानियत,
को इस जहां में कोई तोल नहीं सकता.
वैसे ही हिम्मत, माद्दे, जज़्बे और संस्कारों,
का इस इस कायनात में कोई मोल नहीं हो सकता.

जो बंद हुआ कल, उसे सिर्फ रोशनदान मानो,
क्योंकी आगे अनेक दरवाजे राह में हैं तुम्हारे.
जिससे चूक गये उसे सिर्फ एक पड़ाव मानो,
क्योंकी मंजिलें इंतज़ार में हैं तुम्हारे.

खुद पे हैसला और ईश्वर पे यकीन,
बस यही मनुज का संबल है.
आँधियों से डर के बैठ जाते हैं लोग अक्सर,
पर उसमें भी जो दिया जलाए वही आत्मबल है.

© सुशील मिश्र.

11/03/2014