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दीपोत्सव
अंधेरा छटेगा दीपक जलेगा,
नई आस का फिर उजाला दिखेगा.
कठिन राह आसान होती दिखेगी,
उम्मीद का दिया देखो फिर से जलेगा.
बुराई का सम्बल ठहरा बहुत है,
उम्मीदों पे भी देखो पहरा बहुत है.
मगर रोशनी गर जलाएं दिलों में,
सच का समन्दर गहरा बहुत है.
उजाले का उत्सव खुशी से मनायें,
बच्चों को विद्या का दीपक दिखाएँ.
रोशनी से जगमग आँगन हो सबका,
दीपोत्सव की सबको मंगलकामनाए.
© सुशील मिश्र.
10/11/15
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Yatharth means Reality and Drishtant means Opinion. The opinion which is based on reality is called YATHARTH DRISHTANT. Through this bolg i want to express my views about different sort of issues (politics, culture, society, literature, arts etc... ) in the form of poetry.
Wednesday, November 11, 2015
दीपोत्सव
Thursday, October 8, 2015
बदनाम सियासत
बदनाम सियासत
दीन-ओ-ईमान को मुसलसल,
जो यहाँ बदनाम करते हैं.
कुछ लोग हमारी सियासत में,
अब ऐसे भी काम करते हैं.
पता है! जिन्हें मुल्क का,
पहरेदार बनाया हैं हमने.
आजकल वो ही कौमी एकता के
लिए.
कफ़न का इंतज़ाम करते हैं.
हाँ, आपने दुरुस्त समझा,
ये वो ही हैं जो सर-ऐ-आम,
वतन की आबरू नीलाम करते
हैं.
जले पे मिर्च का कुछ लोग,
अब यूं इंतज़ाम करते हैं.
के जख्म अपनों का हो,
तब भी चर्चा-ऐ-आम करते
हैं.
खुद के गिरेबाँ में
जिन्हें,
झांकाना ना आया अब तलक.
यहाँ कुछ ऐसे सियासतदाँ भी
हैं,
जो कौमी (देश) इख्तलाफत
(मनमुटाव) भी
दुनिया के बाज़ार में खुल-ऐ-आम
करते हैं.
© सुशील मिश्र.
07/10/15
Sunday, July 5, 2015
दिलों के दर्द
दिलों के दर्द
सही हो तो गलत से यूँ
कभी झुठलाये नहीं जाते,
जो आंसूं गम के हैं
तो सब को बतलाये नहीं जाते.
ये दुनिया जालसाज़ी और
फ़रेबी हो गई है अब,
दिलों के दर्द
चौराहों पे दिखलाये नहीं जाते.
समन्दर की सतह पर मोती
मिला नहीं करते,
बवंडर की केवल खबर पर
हौसले झुका नहीं करते.
जो तुमको मालूम है की
अंगारों भरा सफ़र है ये,
तो, दिलों के दर्द
चौराहों पे दिखलाये नहीं जाते.
ग़मों का एक समंदर है
तेरे दिल में मेरे दिल में,
इबादत भी अजब सी है
तेरे दिल में मेरे दिल में.
पर हसेंगे लोग जो
दर्दे दिल बयां कर दिया तूने,
क्योंकि, दिलों के दर्द
चौराहों पे दिखलाये नहीं जाते.
© सुशील मिश्र
05/07/2015
Sunday, June 21, 2015
शमशीर हो गया हूँ मैं
शमशीर हो गया
हूँ मैं
खामोश परिंदों सा हो
गया हूँ मैं,
अब तो लगता है की,
कहीं खो गया हूँ मैं.
सब मसरूफ़ हैं खुद की
ही सुनाने में,
ऐसा क्यों लगता है,
के मज़बूर हो गया हूँ
मै.
ज़िंदगी ने एक साथ
इतने रंग दिखाए,
कि अब तो लगता है,
बस उसी की तस्वीर हो
गया हूँ मै.
अपनी बातों का फलसफा
मुझे कुछ यूँ दिखा,
कि शबे रात भी,
शहर की तहरीर हो गया
हूँ मै.
अन्याय के खिलाफ
मैंने अभी कदम उठाया ही था,
के दुनिया जहान में,
जाने क्यों शमशीर हो
गया हूँ मैं.
© सुशील मिश्र
21/06/2015
Monday, January 12, 2015
असर
असर
हम वो हैं जो हारकर
भी जीतने का हुनर रखते हैं,
मंजिल की हमें परवाह
नहीं,
क्योंकी हम वो हैं,
जो पावों में ही सफ़र
रखते हैं.
मुकद्दर में होगा तो
मिल ही जायेगी मंजिल,
और मिल भी गई तो क्या
करेंगे उसका,
क्योंकी हम तो वो
हैं,
जो अपने सफ़र में ही
असर रखते हैं.
साजिशें करके लोग
यहाँ मैदान मार लेते हैं,
और सोचते हैं की किसी
को कुछ पता ही नहीं.
पर हम वो हैं, जो ढकी
पलकों और बंद कानो से भी,
एक एक बात की खबर
रखते हैं.
मानते हैं की मिठाई
में,
स्वाद बहुत होता है,
पर हम जीभ की नहीं,
सेहत की फिकर रखते
हैं.
लाग-लपेट या चापलूसी
करके,
हम भी एक जगह टिके रह
सकते थे.
पर क्या करें,
हम वो हैं, जो
खुद्दारी का जिगर रखते है.
तीन पांच करके आजकल
लोग दौलत तो बहुत कमाते हैं,
पर इस दौरान वो अपनी
खुद की नज़रों से ही गिर जाते हैं.
और एक हम हैं, जिसकी
जेब भले खाली है,
पर हम अपने सिफर में
भी करोड़ों का असर रखते हैं.
ये सच है की झुकते तो
फायदे में रहते,
लेकिन क्या करे, हर
दर पे जो झुक जाए,
ऐसा सर नहीं अपना,
इसीलिए हम भरी भीड़
में भी एक अलग सा असर रखते हैं.
जा रहे हैं यहाँ से
कहीं और, और फिर वहां से भी कहीं और,
सर उठा के और धमक के
साथ बढ़ते जाना ही फितरत है मेरी.
क्योंके अब तो ज़माने
को भी ये मालूम है की हम वो हैं,
जो मुद्दतों तलक
लोगों के दिलों में असर रखते हैं.
इसीलिए हम भरी भीड़
में भी एक अलग सा असर रखते हैं.
हम वो हैं, जो
खुद्दारी का जिगर रखते है.
हम जीभ की नहीं, सेहत
की फिकर रखते हैं.
हम वो हैं, जो ढकी
पलकों और बंद कानो से भी,
एक एक बात की खबर
रखते हैं.
हम अपने सिफर में भी
करोड़ों का असर रखते हैं
हम तो वो हैं, जो
अपने सफ़र में ही असर रखते हैं.
हम वो हैं जो हारकर
भी जीतने का हुनर रखते हैं.
©
सुशील मिश्र.
03/01/2015
Friday, November 21, 2014
आँखें
आँखें
कौन कहता है की जुबां
से ही शिकायत होती है,
यहाँ तो आँखें भी
हंगामे मचा देती हैं.
लब तो बेचारे बोलकर
चुप हो गए हैं अब,
दानिस्ता ये आँखें
कुछ बोलती और कुछ बोलती नहीं.
लब ने कहा, सब ने
सुना, समझा वही जो उसने कहा,
पर आँखों की बातें
कुछ अजीब सी हैं यार.
बोलती ही रहती हैं ये
दिन-ओ-रात, पर समझा नहीं
क्या क्या कहा, किससे
कहा, किससे नहीं.
आँखों की बात, या
खुदा, बड़ा तिलिस्म है,
मोहब्बत, अदावत,
खुलूस का बे-साया जिस्म है.
जुबां से बोलकर तो
उसने खींच दी दिखती लकीर,
आँखों से भी उसने खीची
हाँ लकीरें हज़ार, पर दिखती नहीं.
लब तो बेचारे बोलकर
चुप हो गए हैं अब,
दानिस्ता ये आँखें
कुछ बोलती और कुछ बोलती नहीं.
दानिस्ता = (जानबूझकर/deliberately),
तिलिस्म = (जादू/magic), अदावत = (दुश्मनी/ill-will)
© सुशील मिश्र
21/11/2014
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