Saturday, February 13, 2016

रावण

रावण


दुनिया में ज़ुल्मतों का बाज़ार ही गरम है,
झूठों फरेबियों पर सरकार क्यूँ नरम है.
कोई वतन के खातिर दिन रात गल रहा है,
गर तू नहीं ये समझा तो ये तेरा भरम है.

विद्या ददाति विनयं बचपन में ही पढ़ा था,
है एकता में शक्ति ये भी तभी पढ़ा था.
ये कौन सा विनय है और कौन सी है विद्या,
कुत्सित स्वरुप जिसका पिछले दिनों दिखा था.

हाँ बात कर रहा हूँ मै उसी जेनयू की,
समाज में बैठे उस वैचारिक बदबू की.
अब भी नहीं जो चेते तो मन्ज़र यही दिखेगा,
धज्जियाँ उड़ायेंगे वे वतन के आबरू की.

इमदाद सब्सिडी पर ये सांप जो पले हैं,
हैं गल्तियाँ हमारी तभी ये फूले-फले हैं.
कानून सख्त कर दो है वक्त की ज़रुरत, वर्ना
क्या मुह दिखाएँगे उन्हें जो बर्फ में गले हैं.

अफ़ज़ल और याकूब की पैरवी जो कर रहे हैं,
राष्ट्रधर्म का मतलब वे जानते नहीं हैं.
हमने कहावतों में ये बात सुन रखी थी,
के लातों के भूत बातों से मानते नहीं हैं.

शिक्षा के मंदिरों में सियासत पनप रही है,
वो भी इतनी गंदी की उसकी वकत नहीं है.
अब भी समय है देखो रस्ते बदल लो वर्ना,
खुद ही बनोगे खुदखुश इसमें ग़ज़ब नहीं है.

इराक सीरिया हो या लीबिया को देखो,
चाहे कुवैत हो या ट्यूनीशिया को देखो.
हाँ आग और तबाही चारों तरफ है बिखरी,
वो बस यहाँ न पहुंचे इस वाकया को देखो.

माँ भारती के सुत हो इसका गुमान रक्खो,
संसद सड़क या सीमा एक इम्तहान रक्खो.
रावण छुपे हुए हैं कुछ नए भेष में फिर,
हांथों में अपने फिर से अब तुम कमान रक्खो.

© सुशील मिश्र.

13/02/16

Sunday, November 15, 2015

हक़

हक़

हमें इल्जाम देके गुनहगार बनाया है उसने,
खता क्या थी ये भी नहीं बताया है उसने.
हमने तो बहुत मेहनत से,
पहाड़ों में भी रस्ता निकाला,
मगर आज हमें ही रस्ते पे लाया है उसने.

मेहनत की शिद्दत को नहीं देखा उसने,
हमारी पुरज़ोर हिम्मत को नहीं देखा उसने.
गम इस बात का नहीं के फैसला मेरे खिलाफ था,
गम तो इस बात का है की,
फैसले को उसूल के तराज़ू से नहीं परखा उसने.

ऐसा लगता है के मेरे किरदार को ठीक से पढ़ा नहीं उसने,
और ये सच है! के सच को, सच से गढ़ा नहीं उसने.
इतना तो हक़ था के जान पाते,
की खता क्या थी हमारी,
मगर हमें इस हक़ से भी बेदख़ल किया उसने.

हमें इल्जाम देके गुनहगार बनाया है उसने,
खता क्या थी ये भी नहीं बताया है उसने.
हमने तो बहुत मेहनत से,
पहाड़ों में भी रस्ता निकाला,
मगर आज हमें ही रस्ते पे लाया है उसने.

© सुशील मिश्र.
15/11/15


Wednesday, November 11, 2015

दीपोत्सव

दीपोत्सव

अंधेरा छटेगा दीपक जलेगा,
नई आस का फिर उजाला दिखेगा.
कठिन राह आसान होती दिखेगी,
उम्मीद का दिया देखो फिर से जलेगा.

बुराई का सम्बल ठहरा बहुत है,
उम्मीदों पे भी देखो पहरा बहुत है.
मगर रोशनी गर जलाएं दिलों में,
सच का समन्दर गहरा बहुत है.

उजाले का उत्सव खुशी से मनायें,
बच्चों को विद्या का दीपक दिखाएँ.
रोशनी से जगमग आँगन हो सबका,
दीपोत्सव की सबको मंगलकामनाए.

© सुशील मिश्र.
10/11/15


Thursday, October 8, 2015

बदनाम सियासत

बदनाम सियासत

दीन-ओ-ईमान को मुसलसल,
जो यहाँ बदनाम करते हैं.
कुछ लोग हमारी सियासत में,
अब ऐसे भी काम करते  हैं.
पता है! जिन्हें मुल्क का,
पहरेदार बनाया हैं हमने.
आजकल वो ही कौमी एकता के लिए.
कफ़न का इंतज़ाम करते हैं.
हाँ, आपने दुरुस्त समझा,
ये वो ही हैं जो सर-ऐ-आम,
वतन की आबरू नीलाम करते हैं.

जले पे मिर्च का कुछ लोग,
अब यूं इंतज़ाम करते हैं.
के जख्म अपनों का हो,
तब भी चर्चा-ऐ-आम करते हैं.
खुद के गिरेबाँ में जिन्हें,
झांकाना ना आया अब तलक.
यहाँ कुछ ऐसे सियासतदाँ भी हैं,
जो कौमी (देश) इख्तलाफत (मनमुटाव) भी
दुनिया के बाज़ार में खुल-ऐ-आम  करते हैं.


© सुशील मिश्र.

  07/10/15