Wednesday, November 7, 2012




स्वार्थ सिद्धी के भँवर में जग चतुर्दिक फंस रहा है,
स्वयं के हित-चिन्तनों में आज मानस फंस रहा है,
आत्मबल के साथ परहित का संदेशा कौन दे जब,
मार्गदर्शक ही यहाँ अब स्यन्दनों (क्षरण) में फंस रहा है.

© सुशील मिश्र. 

Tuesday, November 6, 2012




संघर्षों में, वीरानों में अंधियारों से लड़ते रहना,
संकल्पों की मनोवृत्ति ले आतप में भी तपते रहना,
सर्द हवा, बारिश, अंगारे मिलकर भी कुछ कर ना पायें,
तुम अंगद के पाँव सरीखे अपनी धुन में रमते रहना.

© सुशील मिश्र.

Friday, November 2, 2012




कुछ हारों में जीत छिपी है, ऐसा चिन्तन क्यों न करें,
जो सत्य प्रचारित नहीं हुआ उसका अभिनन्दन क्यों न करें,
झूठ, फरेब, दर्द, दावानल जब सुरसा सा मुह खोले हैं,
सत्य, अहिंसा, त्याग, समर्पण जैसा वंदन क्यों न करें.

©सुशील मिश्र.

सीमित में असीमित


सीमित में असीमित


सीमित शब्दों के वर्तन से,
जो भी असीमित भाव जगाये.
असीमित भावों के परिचालन से,
जन जन के मन को जो भाये.
जन जन के मन ने जो छेड़े,
संवर्धन के पुष्प सलोने.
संवर्धित उन पुष्पदलों से,
आओ हम जग को महकाएँ.

                      आओ हम जग को महकाएँ,
                      उन संवर्धित पुष्पदलों से.
                      जिन संवर्धित पुष्पदलों का,
                       नाता है जन जन के मन से.
                      जन जन के मन को जो कर दे,
                      असीमित भावों से सुरभित.
                      सुरभित भावों की असीमितता,
                      वर्णित कर दें सीमित शब्दों से.

                                                                           © सुशील मिश्र.

Thursday, November 1, 2012

कुंदन


वही मनुज है जो कंटक पथ पर,
चलकर भी राह बनाए.
और प्रबलता मिलती उसको,
जो पीड़ित के हित मार्ग सुझाए.
कष्ट, आतप, पत्थर, पानी,
संघर्षों कि यही कहानी,
इनमे से जो तपकर आता,
जग में वो कुंदन कहलाता.

 © सुशील मिश्र.

Monday, October 29, 2012

अंतर्द्वंद



अंतर्द्वंद

वक्त वक्त पे छोटी छोटी खुशियों ने पुकारा हमेंलेकिन,
हमने समंदर की चाह में ना जाने कितनी नदियों का दिल तोड़ा.
ऊँचा ख्वाबऊँचा ओहदा और ऊँचे करिश्मे की सोच ने,
हमारी इस ज़िंदगी को कहीं का ना छोंड़ा.

जानता था की लाख मुश्किलें आएँगी राह में लेकिन,
गांव छोंड़ाशहर आयादिल में ये तमन्ना लिए हुए.
के अपने जुनूनअपने ज़ज्बे और अपनी काबिलियत से,
एक दिन आसमां पे जाउंगा अपना वजूद लिए हुए.

सोते जागते उठते बैठते हर पल हर क्षण,
आसमां आसमां आसमां यही ख्वाब रहता था मन में.
तरक्की और ऊँचाई ने ईतना ऊपर उठाया,
की मैं देख भी नहीं पाया,
की क्या हो रहा है असली चमन में.

निस्स्संदेह आज मेरी मेहनत रंग लाई है,
गाँव छोडनें और शहर में बसने की कीमत मैंने पाई है.
धन दौलत रूपया पैसा महल जागीर,
आज मैंने सब कुछ कमाया है.

लेकिन,

पता नहीं क्यूं आज जब फुर्सत में,
अपने कीमती सोफों पर इत्मीनान से बैठने की सोचता हूँ,
तो जिन खेतोंखलिहानोंमेड़ों (पगडंडियों)और इन्दारों (कुआँ),
जिन बगीचोंछप्परोंबावडियों और दुआरों (द्वार),
से खीझ खाकर और जिन्हें गरीबी और दरिद्रता का मानक,
मानकर मैं वहाँ से भागा था.

वे सब मुझे बुला रहें हैं,
या यूँ कहें की मै इतनी दूर शानो शौकत में बैठकर भी,
सफलता की बुलंदियों पर पहुँच कर भी,
उन छुद्र चीजों और स्थानों की तरफ आकर्षित हो रहा हूँ.

मेरा मन समझ नहीं पा रहा है.
की ये क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है,
क्या ये  मेरी उचाईयों पे पहुचने का का अंत है,
क्या ये मेरे अधोपतन (नीचे गिरनाकी शुरुआत है,
क्या यह चिंतन और यह विचार,
मेरे अर्श से फर्श तक जाने की प्रक्रिया है.

ये विचार ये भावनाएँ ये चिंतन,
मेरे अंतर्मन को लगातार कुरेद रहे हैं,
और मैं स्वयं को इस मानसिक द्वन्द में उलझा हुआ,
इन सही गलत के विचारों में घिरा हुआ,
इस हानि लाभ के जोड़ घटानों में फंसा हुआ,
खुद को आज त्रिशंकु की स्थिति में पाता हूँ.

जो यह समझ ही नहीं पा रहा है,
जो यह निश्चित ही नहीं कर पा रहा है,
की मूल क्या है,
वास्तविकता क्या है.

आज जब हम ग्रहण (भोजनघर के बाहर (होटेल,
और निष्कासन (फ्रेशघर के अंदर (टोइलेट) करने लगे,
अर्थात घर का काम बाहर,
और बहार का काम घर में करने कि व्यवस्थाएं बदलने लगे.

अपने इतिहाससंस्कृति और परिपाटी को,
जितना संभव था तोड़ा मरोड़ा,
मिठाई को चोकलेट के लिएरस को पेप्सी के लिए,
धोती कुर्ते को पैंट शर्ट और दीपक को कैंडल के लिए छोड़ा.

कमोबेश मेरे जैसी ही मेरे देश कि भी हालत हो गई है,
हमने पुरानी परम्पराओंरीतियोंनीतियों
और शिक्षाके विधान को,
विकसित बनने कि चाह में छोड़ा.

इस सही और गलतइस अच्छे और खराब एवं
इस पुरातन और नवीन के अंतर्द्वंद में उलझा हुआ मन,
फिर से वहीं लौटना चाहता है,
जहां खुला आकाशदूर दूर तक हरियाली और सुन्दर विहान है.

जब पुनः गाँव लौटा तब समझ में आया,
कि जीवन में कभी धूप है कभी छाँव है
मन को नियंत्रित रखना और मूल से कभी ना भटकना,
असल में यही विधि का विधान है.
असल में यही विधि का विधान है.
असल में यही विधि का विधान है.

© सुशील मिश्र .