Friday, November 21, 2014

आँखें

आँखें


कौन कहता है की जुबां से ही शिकायत होती है,
यहाँ तो आँखें भी हंगामे मचा देती हैं.
लब तो बेचारे बोलकर चुप हो गए हैं अब,
दानिस्ता ये आँखें कुछ बोलती और कुछ बोलती नहीं.

लब ने कहा, सब ने सुना, समझा वही जो उसने कहा,
पर आँखों की बातें कुछ अजीब सी हैं यार.
बोलती ही रहती हैं ये दिन-ओ-रात, पर समझा नहीं
क्या क्या कहा, किससे कहा, किससे नहीं.

आँखों की बात, या खुदा, बड़ा तिलिस्म है,
मोहब्बत, अदावत, खुलूस का बे-साया जिस्म है.
जुबां से बोलकर तो उसने खींच दी दिखती लकीर,
आँखों से भी उसने खीची हाँ लकीरें हज़ार, पर दिखती नहीं.

लब तो बेचारे बोलकर चुप हो गए हैं अब,
दानिस्ता ये आँखें कुछ बोलती और कुछ बोलती नहीं.

दानिस्ता = (जानबूझकर/deliberately), तिलिस्म = (जादू/magic), अदावत = (दुश्मनी/ill-will)

© सुशील मिश्र
   21/11/2014


Thursday, October 30, 2014

किस काम का

किस काम का

भूखा अकुलाता यौवन भी,
बोलो भला किस काम का.
बिन बरसातों का सावन,
बोलो भला किस काम का.
लक्ष्य निश्चित ही नहीं,
जो कर सके खुद के लिए.
गाँडीव उनको मिल भी जाए,
तो भी भला किस काम का.

सरहद बड़ी सेना बड़ी,
मुस्तैद है वो हर घड़ी.
पर भाव दिल में यदि नहीं,
तो कारवां किस काम का.
कफ़न तो सर पर सजाये,
वो दिन रात सीमा पर खड़ा.
सरकार हिम्मत ना जुटाए,
तो काफ़िला किस काम का.

आँखों पे पर्दा पड़ा है,
और बुद्धि भी है भ्रमित जिसकी.
लाख दर्पण तुम दिखा दो,
ये सब नहीं कुछ काम का.
समय का साथ और खुद पर विश्वास,
जिसने नहीं जाना समझ ले.
पारस उन्हें गर मिल भी जाए,
तो भी भला किस काम का.

© सुशील मिश्र.
 27/10/2014



Thursday, July 3, 2014

फ़लसफ़ा

फ़लसफ़ा


सफ़र मुश्किल तो होता है, मगर हिम्मत भी देता है.
दिलों में हो अगर जज़्बा, तो ये जन्नत ही देता है.

एक तो अँधेरी हैं ये रातें, और मंजिल भी पहेली है.
इसमें भी जो तू हौसला कर ले, तो वो इनायत ही देता है.

दिन-रात, अँधेरे-उजाले, सिखाते रहे ज़िंदगी का फलसफा.
इबादत के सफ़र में, साथ भी मोहब्बत ही देता है.

बुजुर्गों की दुआएं, जो समेटे अपने दामन में.
खुदा का नूर एहसासों में ढलकर, उन्हें रहमत ही देता है.

दरख्तों को ज़रा देखो, या फिर तुम दरिया को ही देखो.
हज़ारों ज़ुल्म सहकर भी, हमें जीवन ही देता है.

सफ़र मुश्किल तो होता है, मगर हिम्मत भी देता है.
दिलों में हो अगर जज़्बा, तो ये जन्नत ही देता है.

© सुशील मिश्र.
   03/07/2014







Sunday, June 15, 2014

माँ- बाप

माँ- बाप

बवंडर कितने भी हों खूंखार,
वो उनको मोड़ जाते हैं.
तपिश सूरज की खुद सह कर,
शीतल हवाएँ छोड़ जाते हैं.

दिलों में दफ़न कर के,
ज़िंदगी भर के अरमान.
वो सिर्फ हमारे लिए,
खुला आकाश छोड़ जाते हैं.

हमारी गलतियों पे भी सदा,
जो दुनिया के ताने झेल जाते हैं.
ज़माने के तंज़ सुनकर भी,
प्यार और मोहब्बत छोड़ जाते हैं.

हमने कितनी ही गुस्ताखियों से उनका,
दिल दुखाया हो भले लेकिन.
ये माँ-बाप ही हैं जो,
चोट सह कर भी दुआएं छोड़ जाते हैं.

© सुशील मिश्र.

  15/06/2014

Sunday, May 25, 2014

चेहरा

चेहरा

एक चेहरे पे कितने चेहरे लिए,
आज देखो यहाँ घूमता आदमी.
मुस्कराहट लबों पे भी नकली लिए,
अब तो अपना बना कर छले आदमी.

जब थे मतलब के दिन वो तुम्हारा रहा,
तुम समन्दर थे जब वो किनारा रहा.
आज पानी तुम्हारा जो कम हो गया,
वो किनारा भी अब ना सहारा रहा.

एक चमकता सितारा थे जब तुम कभी,
ये चमकती फिजायें भी थीं साथ में.
रौशनी की ज़रा सी कमी क्या हुई,
एक दिया तक नहीं है तो अब पास में.

मतलबी क्यूं बना इतना इंसान अब,
आदमी क्यों बना है जी शैतान अब.
मन में झांकें तो पायेंगे बस बात ये,
दिन को दिन कह दिया था भरी रात में.

एक चेहरे पे कितने चेहरे लिए,
आज देखो यहाँ घूमता आदमी.
मुस्कराहट लबों पे भी नकली लिए,
अब तो अपना बना कर छले आदमी.

© सुशील मिश्र.

  25/05/2014

Thursday, May 15, 2014

ऐसा क्यों इंसान है


ऐसा क्यों इंसान है


एक चहरे पे कई चहरे,
ऐसा तो इंसान है,
फितरत जिसकी गिरगिट जैसी,
ऐसा क्यों इंसान है.

कल तक था जो खिला खिला सा,
खुशबू बांटा करता था.
आज नज़रिया उसका बदला,
ऐसा क्यों इंसान है.

सीधा सादा हिम्मतवाला,
सच जिसकी हर बातों में था.
वही झूठ का बना खिलाड़ी,
ऐसा क्यों इंसान है.

दिल का दर्द जुबां पे जिसके,
हमने सुना नहीं था अब तक.
अब लोगों के राज़ बेचता,
ऐसा क्यों इंसान है.

एक चहरे पे कई चहरे,
ऐसा तो इंसान है,
फितरत जिसकी गिरगिट जैसी,
ऐसा क्यों इंसान है.

© सुशील मिश्र.

15/04/2014

Friday, April 25, 2014

सही रास्ता


सही रास्ता

नदी ही समन्दर का है रास्ता,
हवा ही बवंडर का है रास्ता.
खिलाफत पे दुनिया उतारू अगर है,
समझ लो मुकद्दस है ये रास्ता.

बढ़े जा अकेले जो अच्छा है दिल से,
वही तूफां झेले जो सच्चा है दिल से.
यही रीत है, और दस्तूर भी है,
बेख़ौफ़ नज़रें मिलाये जो कातिल से.

है छोटा बहुत पर असर भी बहुत है,
मदद की न दरकार उसको फ़कत है.
चमकता है जो खुद की रोशनी से,
जुगनू को लाज़िम ना कोई मदद है.

अन्धेरा जिसे देखकर भागता है,
सवेरा जिसे देखकर जागता है.
है उम्मीद की वो ऐसी ललक,
की सूरज भी जिससे किरण मांगता है.

मोहब्बत का बदला मोहब्बत से जो दे,
अदावत का बदला अदावत से जो दे.
वतन को ज़रुरत है ऐसे जिगर की,
हूकूमत का बदला हूकूमत से जो दे.

नदी ही समन्दर का है रास्ता,
हवा ही बवंडर का है रास्ता.
खिलाफत पे दुनिया उतारू अगर है,
समझ लो मुकद्दस है ये रास्ता.


© सुशील मिश्र.

25/04/2014