Sunday, July 5, 2015

दिलों के दर्द

दिलों के दर्द

सही हो तो गलत से यूँ कभी झुठलाये नहीं जाते,
जो आंसूं गम के हैं तो सब को बतलाये नहीं जाते.
ये दुनिया जालसाज़ी और फ़रेबी हो गई है अब,
दिलों के दर्द चौराहों पे दिखलाये नहीं जाते.

समन्दर की सतह पर मोती मिला नहीं करते,
बवंडर की केवल खबर पर हौसले झुका नहीं करते.
जो तुमको मालूम है की अंगारों भरा सफ़र है ये,
तो, दिलों के दर्द चौराहों पे दिखलाये नहीं जाते.

ग़मों का एक समंदर है तेरे दिल में मेरे दिल में,
इबादत भी अजब सी है तेरे दिल में मेरे दिल में.
पर हसेंगे लोग जो दर्दे दिल बयां कर दिया तूने,
क्योंकि, दिलों के दर्द चौराहों पे दिखलाये नहीं जाते.

© सुशील मिश्र
 05/07/2015




Sunday, June 21, 2015

शमशीर हो गया हूँ मैं

शमशीर हो गया हूँ मैं


खामोश परिंदों सा हो गया हूँ मैं,
अब तो लगता है की,
कहीं खो गया हूँ मैं.

सब मसरूफ़ हैं खुद की ही सुनाने में,
ऐसा क्यों लगता है,
के मज़बूर हो गया हूँ मै.

ज़िंदगी ने एक साथ इतने रंग दिखाए,
कि अब तो लगता है,
बस उसी की तस्वीर हो गया हूँ मै.

अपनी बातों का फलसफा मुझे कुछ यूँ दिखा,
कि शबे रात भी,
शहर की तहरीर हो गया हूँ मै.

अन्याय के खिलाफ मैंने अभी कदम उठाया ही था,
के दुनिया जहान में,
जाने क्यों शमशीर हो गया हूँ मैं.


© सुशील मिश्र

    21/06/2015

Monday, January 12, 2015

असर

असर

हम वो हैं जो हारकर भी जीतने का हुनर रखते हैं,
मंजिल की हमें परवाह नहीं,
क्योंकी हम वो हैं,
जो पावों में ही सफ़र रखते हैं.

मुकद्दर में होगा तो मिल ही जायेगी मंजिल,
और मिल भी गई तो क्या करेंगे उसका,
क्योंकी हम तो वो हैं,
जो अपने सफ़र में ही असर रखते हैं.

साजिशें करके लोग यहाँ मैदान मार लेते हैं,
और सोचते हैं की किसी को कुछ पता ही नहीं.
पर हम वो हैं, जो ढकी पलकों और बंद कानो से भी,
एक एक बात की खबर रखते हैं.

मानते हैं की मिठाई में,
स्वाद बहुत होता है,
पर हम जीभ की नहीं,
सेहत की फिकर रखते हैं.

लाग-लपेट या चापलूसी करके,
हम भी एक जगह टिके रह सकते थे.
पर क्या करें,
हम वो हैं, जो खुद्दारी का जिगर रखते है.

तीन पांच करके आजकल लोग दौलत तो बहुत कमाते हैं,
पर इस दौरान वो अपनी खुद की नज़रों से ही गिर जाते हैं.
और एक हम हैं, जिसकी जेब भले खाली है,
पर हम अपने सिफर में भी करोड़ों का असर रखते हैं.

ये सच है की झुकते तो फायदे में रहते,
लेकिन क्या करे, हर दर पे जो झुक जाए,
ऐसा सर नहीं अपना,
इसीलिए हम भरी भीड़ में भी एक अलग सा असर रखते हैं.

जा रहे हैं यहाँ से कहीं और, और फिर वहां से भी कहीं और,
सर उठा के और धमक के साथ बढ़ते जाना ही फितरत है मेरी.
क्योंके अब तो ज़माने को  भी ये मालूम है की हम वो हैं,
जो मुद्दतों तलक लोगों के दिलों में असर रखते हैं.

इसीलिए हम भरी भीड़ में भी एक अलग सा असर रखते हैं.
हम वो हैं, जो खुद्दारी का जिगर रखते है.
हम जीभ की नहीं, सेहत की फिकर रखते हैं.
हम वो हैं, जो ढकी पलकों और बंद कानो से भी,
एक एक बात की खबर रखते हैं.
हम अपने सिफर में भी करोड़ों का असर रखते हैं
हम तो वो हैं, जो अपने सफ़र में ही असर रखते हैं.
हम वो हैं जो हारकर भी जीतने का हुनर रखते हैं.

© सुशील मिश्र.
  03/01/2015





Friday, November 21, 2014

आँखें

आँखें


कौन कहता है की जुबां से ही शिकायत होती है,
यहाँ तो आँखें भी हंगामे मचा देती हैं.
लब तो बेचारे बोलकर चुप हो गए हैं अब,
दानिस्ता ये आँखें कुछ बोलती और कुछ बोलती नहीं.

लब ने कहा, सब ने सुना, समझा वही जो उसने कहा,
पर आँखों की बातें कुछ अजीब सी हैं यार.
बोलती ही रहती हैं ये दिन-ओ-रात, पर समझा नहीं
क्या क्या कहा, किससे कहा, किससे नहीं.

आँखों की बात, या खुदा, बड़ा तिलिस्म है,
मोहब्बत, अदावत, खुलूस का बे-साया जिस्म है.
जुबां से बोलकर तो उसने खींच दी दिखती लकीर,
आँखों से भी उसने खीची हाँ लकीरें हज़ार, पर दिखती नहीं.

लब तो बेचारे बोलकर चुप हो गए हैं अब,
दानिस्ता ये आँखें कुछ बोलती और कुछ बोलती नहीं.

दानिस्ता = (जानबूझकर/deliberately), तिलिस्म = (जादू/magic), अदावत = (दुश्मनी/ill-will)

© सुशील मिश्र
   21/11/2014


Thursday, October 30, 2014

किस काम का

किस काम का

भूखा अकुलाता यौवन भी,
बोलो भला किस काम का.
बिन बरसातों का सावन,
बोलो भला किस काम का.
लक्ष्य निश्चित ही नहीं,
जो कर सके खुद के लिए.
गाँडीव उनको मिल भी जाए,
तो भी भला किस काम का.

सरहद बड़ी सेना बड़ी,
मुस्तैद है वो हर घड़ी.
पर भाव दिल में यदि नहीं,
तो कारवां किस काम का.
कफ़न तो सर पर सजाये,
वो दिन रात सीमा पर खड़ा.
सरकार हिम्मत ना जुटाए,
तो काफ़िला किस काम का.

आँखों पे पर्दा पड़ा है,
और बुद्धि भी है भ्रमित जिसकी.
लाख दर्पण तुम दिखा दो,
ये सब नहीं कुछ काम का.
समय का साथ और खुद पर विश्वास,
जिसने नहीं जाना समझ ले.
पारस उन्हें गर मिल भी जाए,
तो भी भला किस काम का.

© सुशील मिश्र.
 27/10/2014



Thursday, July 3, 2014

फ़लसफ़ा

फ़लसफ़ा


सफ़र मुश्किल तो होता है, मगर हिम्मत भी देता है.
दिलों में हो अगर जज़्बा, तो ये जन्नत ही देता है.

एक तो अँधेरी हैं ये रातें, और मंजिल भी पहेली है.
इसमें भी जो तू हौसला कर ले, तो वो इनायत ही देता है.

दिन-रात, अँधेरे-उजाले, सिखाते रहे ज़िंदगी का फलसफा.
इबादत के सफ़र में, साथ भी मोहब्बत ही देता है.

बुजुर्गों की दुआएं, जो समेटे अपने दामन में.
खुदा का नूर एहसासों में ढलकर, उन्हें रहमत ही देता है.

दरख्तों को ज़रा देखो, या फिर तुम दरिया को ही देखो.
हज़ारों ज़ुल्म सहकर भी, हमें जीवन ही देता है.

सफ़र मुश्किल तो होता है, मगर हिम्मत भी देता है.
दिलों में हो अगर जज़्बा, तो ये जन्नत ही देता है.

© सुशील मिश्र.
   03/07/2014







Sunday, June 15, 2014

माँ- बाप

माँ- बाप

बवंडर कितने भी हों खूंखार,
वो उनको मोड़ जाते हैं.
तपिश सूरज की खुद सह कर,
शीतल हवाएँ छोड़ जाते हैं.

दिलों में दफ़न कर के,
ज़िंदगी भर के अरमान.
वो सिर्फ हमारे लिए,
खुला आकाश छोड़ जाते हैं.

हमारी गलतियों पे भी सदा,
जो दुनिया के ताने झेल जाते हैं.
ज़माने के तंज़ सुनकर भी,
प्यार और मोहब्बत छोड़ जाते हैं.

हमने कितनी ही गुस्ताखियों से उनका,
दिल दुखाया हो भले लेकिन.
ये माँ-बाप ही हैं जो,
चोट सह कर भी दुआएं छोड़ जाते हैं.

© सुशील मिश्र.

  15/06/2014