Monday, October 29, 2012

अंतर्द्वंद



अंतर्द्वंद

वक्त वक्त पे छोटी छोटी खुशियों ने पुकारा हमें, लेकिन,
हमने समंदर की चाह में ना जाने कितनी नदियों का दिल तोड़ा.
ऊँचा ख्वाब, ऊँचा ओहदा और ऊँचे करिश्मे की सोच ने,
हमारी इस ज़िंदगी को कहीं का ना छोंड़ा.

जानता था की लाख मुश्किलें आएँगी राह में लेकिन,
गांव छोंड़ा, शहर आया, दिल में ये तमन्ना लिए हुए.
के अपने जुनून, अपने ज़ज्बे और अपनी काबिलियत से,
एक दिन आसमां पे जाउंगा अपना वजूद लिए हुए.

सोते जागते उठते बैठते हर पल हर क्षण,
आसमां आसमां आसमां यही ख्वाब रहता था मन में.
तरक्की और ऊँचाई ने ईतना ऊपर उठाया,
की मैं देख भी नहीं पाया,
की क्या हो रहा है असली चमन में.

निस्स्संदेह आज मेरी मेहनत रंग लाई है,
गाँव छोडनें और शहर में बसने की कीमत मैंने पाई है.
धन दौलत रूपया पैसा महल जागीर,
आज मैंने सब कुछ कमाया है.

लेकिन,

पता नहीं क्यूं आज जब फुर्सत में,
अपने कीमती सोफों पर इत्मीनान से बैठने की सोचता हूँ,
तो जिन खेतों, खलिहानों, मेड़ों (पगडंडियों)और इन्दारों (कुआँ),
जिन बगीचों, छप्परों, बावडियों और दुआरों (द्वार),
से खीझ खाकर और जिन्हें गरीबी और दरिद्रता का मानक,
मानकर मैं वहाँ से भागा था.

वे सब मुझे बुला रहें हैं,
या यूँ कहें की मै इतनी दूर शानो शौकत में बैठकर भी,
सफलता की बुलंदियों पर पहुँच कर भी,
उन छुद्र चीजों और स्थानों की तरफ आकर्षित हो रहा हूँ.

मेरा मन समझ नहीं पा रहा है.
की ये क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है,
क्या ये  मेरी उचाईयों पे पहुचने का का अंत है,
क्या ये मेरे अधोपतन (नीचे गिरना) की शुरुआत है,
क्या यह चिंतन और यह विचार,
मेरे अर्श से फर्श तक जाने की प्रक्रिया है.

ये विचार ये भावनाएँ ये चिंतन,
मेरे अंतर्मन को लगातार कुरेद रहे हैं,
और मैं स्वयं को इस मानसिक द्वन्द में उलझा हुआ,
इन सही गलत के विचारों में घिरा हुआ,
इस हानि लाभ के जोड़ घटानों में फंसा हुआ,
खुद को आज त्रिशंकु की स्थिति में पाता हूँ.

जो यह समझ ही नहीं पा रहा है,
जो यह निश्चित ही नहीं कर पा रहा है,
की मूल क्या है,
वास्तविकता क्या है.

आज जब हम ग्रहण (भोजन) घर के बाहर (होटेल) ,
और निष्कासन (फ्रेश) घर के अंदर (टोइलेट) करने लगे,
अर्थात घर का काम बाहर,
और बहार का काम घर में करने कि व्यवस्थाएं बदलने लगे.

अपने इतिहास, संस्कृति और परिपाटी को,
जितना संभव था तोड़ा मरोड़ा,
मिठाई को चोकलेट के लिए, रस को पेप्सी के लिए,
धोती कुर्ते को पैंट शर्ट और दीपक को कैंडल के लिए छोड़ा.

कमोबेश मेरे जैसी ही मेरे देश कि भी हालत हो गई है,
हमने पुरानी परम्पराओं, रीतियों, नीतियों
और शिक्षा, के विधान को,
विकसित बनने कि चाह में छोड़ा.

इस सही और गलत, इस अच्छे और खराब एवं
इस पुरातन और नवीन के अंतर्द्वंद में उलझा हुआ मन,
फिर से वहीं लौटना चाहता है,
जहां खुला आकाश, दूर दूर तक हरियाली और सुन्दर विहान है.

जब पुनः गाँव लौटा तब समझ में आया,
कि जीवन में कभी धूप है कभी छाँव है, 
मन को नियंत्रित रखना और मूल से कभी ना भटकना,
असल में यही विधि का विधान है.
असल में यही विधि का विधान है.
असल में यही विधि का विधान है.

© सुशील मिश्र .

Sunday, October 28, 2012




किताब-ए-वक्त में जो कहीं का था,

हज़ार ज़लज़ले सहे होंगे तभी वो था,

पाँव ज़मीं पर यूं टिकाये थे उसने शिद्दत से,

फलक दमकता रहा रौशनी में,

क्योंकि वो ताउम्र खुदा की बंदगी में था.

© सुशील मिश्र.



सहारों कि ज़रूरत उन्हें है जिनकी नज़र किनारों पे है,

चुनौतियाँ तो लहर-दर-लहर दरिया के शिकारों पे है.

इन्तहां हो गई अब तो सितारों में भी तिष्णगी की,

हौसलों कि ज़मीं गर मज़बूत है, तो गगन तेरे इशारों पे है.

© सुशील मिश्र.

Saturday, October 27, 2012

वज़ूद


वज़ूद

ज़माने को ये भरम है कि वो खुद है,
इसीलिए खुदा भी है.
असल में वो ये कहना चाहता है,
कि उसकी खुदी से खुदा का वजूद है.
वो खुद नहीं तो खुदा भी नहीं.

      नादानों को इस बात का इल्म नहीं,
      कि ज़मीं है, फलक है, आब है और हवा है,
      तब जाके तेरा हमसाया भी तेरा हुआ है.
      उसको नहीं ज़रूरत ज़मीं, फलक, आब और हवा की,
      ये उसी की आता कि हुई नेमतें हैं,
      तब जाकर तेराऽऽऽ होना मुनासिब हुआ है.

जब तू खुद में खुदा को देखेगा,
मोहब्बत में वफ़ा को देखेगा,
नेमतें तुझपे ऐसे बरसेंगीं,
ज़माना भी तुझको आशनां होके देखेगा.

वज़ूद – Existance, आशनां - Devoted to love, नेमतें – Gifts, मुनासिब – Possible, आता – Given, फलक – Sky, आब – Water,  इल्म – Knowledge, भरम – Doubt, खुदी – Himself

© सुशील मिश्र.

एक दीपक खुद में जला के रखना ज़रूरी है,
सूरज तो सशंकित आसमानों की तिजोरी है,
रास्ते निगाह में बसा के रखें या ना रखें,
मगर काँटों भरी राह में चलने के लिए ,
               दिल में हौसला बहुत ज़रूरी है.
               दिल में हौसला बहुत ज़रूरी है.

© सुशील मिश्र.

Monday, August 20, 2012


छोटे छोटे बादलों को नभ में फिरने छोड़ दिया,
जल को गंगाजल बतलाकर उनको उत्साह पुरजोर दिया,
वे ना समझे इन पुचकारों और दुलारों का मतलब,
बड़े बड़े सरदारों (भ्रष्टाचारियों) ने झटका उनको घनघोर दिया.

main culprits of BHARSTACHAAR are still out of the reach of investigating agencies.........you know why? because they are busy.....they are extremely busy to run the government. At the same time investigating agencies are getting orders from SARDAR's (culprits) that they must catch someone to show the country that they are busy and getting success to catch these "छोटे छोटे बादल". Means some officers, small rank politicians etc.
….Sushil Mishra