Sunday, October 28, 2012




किताब--वक्त में जो कहीं का था,

हज़ार ज़लज़ले सहे होंगे तभी वो था,

पाँव ज़मीं पर यूं टिकाये थे उसने शिद्दत से,

फलक दमकता रहा रौशनी में,

क्योंकि वो ताउम्र खुदा की बंदगी में था.

© सुशील मिश्र.



सहारों कि ज़रूरत उन्हें है जिनकी नज़र किनारों पे है,

चुनौतियाँ तो लहर-दर-लहर दरिया के शिकारों पे है.

इन्तहां हो गई अब तो सितारों में भी तिष्णगी की,

हौसलों कि ज़मीं गर मज़बूत है, तो गगन तेरे इशारों पे है.

© सुशील मिश्र.

Saturday, October 27, 2012

वज़ूद


वज़ूद

ज़माने को ये भरम है कि वो खुद है,
इसीलिए खुदा भी है.
असल में वो ये कहना चाहता है,
कि उसकी खुदी से खुदा का वजूद है.
वो खुद नहीं तो खुदा भी नहीं.

      नादानों को इस बात का इल्म नहीं,
      कि ज़मीं है, फलक है, आब है और हवा है,
      तब जाके तेरा हमसाया भी तेरा हुआ है.
      उसको नहीं ज़रूरत ज़मीं, फलक, आब और हवा की,
      ये उसी की आता कि हुई नेमतें हैं,
      तब जाकर तेराऽऽऽ होना मुनासिब हुआ है.

जब तू खुद में खुदा को देखेगा,
मोहब्बत में वफ़ा को देखेगा,
नेमतें तुझपे ऐसे बरसेंगीं,
ज़माना भी तुझको आशनां होके देखेगा.

वज़ूद – Existance, आशनां - Devoted to love, नेमतें – Gifts, मुनासिब – Possible, आता – Given, फलक – Sky, आब – Water,  इल्म – Knowledge, भरम – Doubt, खुदी – Himself

© सुशील मिश्र.

एक दीपक खुद में जला के रखना ज़रूरी है,
सूरज तो सशंकित आसमानों की तिजोरी है,
रास्ते निगाह में बसा के रखें या ना रखें,
मगर काँटों भरी राह में चलने के लिए ,
               दिल में हौसला बहुत ज़रूरी है.
               दिल में हौसला बहुत ज़रूरी है.

© सुशील मिश्र.

Monday, August 20, 2012


छोटे छोटे बादलों को नभ में फिरने छोड़ दिया,
जल को गंगाजल बतलाकर उनको उत्साह पुरजोर दिया,
वे ना समझे इन पुचकारों और दुलारों का मतलब,
बड़े बड़े सरदारों (भ्रष्टाचारियों) ने झटका उनको घनघोर दिया.

main culprits of BHARSTACHAAR are still out of the reach of investigating agencies.........you know why? because they are busy.....they are extremely busy to run the government. At the same time investigating agencies are getting orders from SARDAR's (culprits) that they must catch someone to show the country that they are busy and getting success to catch these "छोटे छोटे बादल". Means some officers, small rank politicians etc.
….Sushil Mishra

Friday, June 8, 2012

सपने से सोच तक


सपने से सोच तक

खुली आँखों से सपने देखना और उस सपने में,
किसी को नीचे गिरते हुए देखना.
असल में इससे उसका कुछ नहीं बिगडता है,
जिसको हम सपने में गिरते हुए देखकर, फ़िजूल में खुश हुए जा रहे हैं.

इससे उस व्यक्ति या संगठन (जो कि खुली आँखों से सपने देखता है),
की कमजोरी, बेबसी और लाचारी दिखती है.
और उसे हमेशा इस बात का दुःख रहता है,
कि वो सपने वाले आदमी या संगठन को,
सच में गिरता और दुखी होता नहीं देख पा रहा है.

वास्तविकता में तो  वो उसके सपनों के बाहर है,
और वहाँ पर वो लगातार, और खुश, और मज़बूत हुआ जा रहा है.
फिर सपने देखने वाला उसकी एक एक खुशी,
उन्नति और प्रगति देखकर,
स्वयं को दुःख और अंधकार में धकेलता चला जा रहा है,
और अपने ही हांथों खुद के लिए,
दुःख, अंधकार, विवशता और असफलता रूपी कब्र खोदता जा रहा है.

तो ज़रा सोचिये, कि हम ये कैसा मंज़र बना रहे हैं,
हम असल में किस दिशा में जा रहे हैं,
और इस नकारात्मक सोच एवं विध्वंसक चिंतन से,
अपना मुस्तकबिल (भविष्य) कैसा बना रहे हैं.

आज के मानव समाज कि ये नियति बन गई है,
झूठ, द्वेष, पाखण्ड और अन्याय उसकी सोच बन गई है,
वह सपने में भी किसी का भला या अच्छा नहीं सोच रहा है,
क्योंकि अधम कर्म, गलत चिंतन और विवशता उसकी प्रकृति बन गई है.

आइये हम सब आज ये संकल्प करें कि किसी भी हालात में,
हम अच्छा सोचें और उससे भी ज़रूरी है कि सच्चा सोचें.
क्योंकि सोच ही हमें महान और निम्न बनाती है,
आइये महानता को चुनें और निम्नता को तजें,
कलुषित, घृणित, और अंधकारमय चिंतन को छोंड़,
एक नवीन, उज्जवल और सकारात्मक समाज को गढ़ें.
एक नवीन, उज्जवल और सकारात्मक समाज को गढ़ें.....

                                                                                            © सुशील मिश्र
                                                                                                        08/06/2012


Friday, April 27, 2012

कुछ छन्द


कुछ   छन्द

यूँ नदी के किनारे बहुत हैं मगर,
आसमाँ में सितारे बहुत हैं मगर,
ज़िंदगी में ही सुकूं के ही दो पल नहीं,
वैसे ढेरों नज़ारे बहुत हैं मगर.

हमने चाही थी यारी मिला हमको क्या,
की थी सच की सवारी मिला हमको क्या,
देश को लूटते थे जो अब तक यहाँ,
आज वो हैं पुजारी, मिला हमको क्या.

पुस्तकों से जिन्हें कोई मतलब नहीं,
भाषा विज्ञान से कोई मतलब नहीं,
गीत, कविता, ग़ज़ल आज वो गढ़ रहे,
जिनको साहित्य से कोई मतलब नहीं.

सब इधर का उधर आज क्यों हो रहा,
जो नहीं होना था वो ही क्यों हो रहा,
सोचना था तुम्हे पाप करते समय,
अब ये क्यूँ पूछते हो, ये क्यूँ हो रहा.
©सुशील मिश्र
25/04/2012