Monday, March 18, 2013

राष्ट्रवंदन



राष्ट्रवंदन

राष्ट्रवंदन की प्रथा को हम सभी पोषित करेंगे.
पंथ सुरभित हो सके वह पुष्प अब रोपित करेंगे.

दुःख दावानल जगत में व्याधियों का घर बना है,
संगठन को भूल कर मानस यहाँ आकुल पड़ा है.
भोग लिप्सा अन्तसों में इस तरह जब घर बना ले,
है यही उपयुक्त क्षण हम आत्ममार्जन अब करेंगे.
पंथ सुरभित हो सके..........................................

संस्कृति का क्षरण देखो आज तो चहुंओर होता,
ज्ञान वैभव का निरादर आज तो पुरज़ोर होता.
तमस ही जब ज़िंदगी का एक अविरल रूप ले ले,
तब सुखद संकल्पना से जगत आलोकित करेंगे.
पंथ सुरभित हो सके..........................................


कुछ नये की चाह में अब मूल हमसे दूर होता,
यज्ञ वंदन भूलकर मानव नये उत्सव पिरोता.
स्वयं के हित चिन्तनों में आज हैं हम देश भूले,
प्रण यही अब हो हमारा राष्ट्र को उन्नत करेंगें.
पंथ सुरभित हो सके.........................................

राष्ट्रवंदन की प्रथा को हम सभी पोषित करेंगे.
पंथ सुरभित हो सके वह पुष्प अब रोपित करेंगे.

© सुशील मिश्र.
18/03/2013




Thursday, March 7, 2013

आदमी का दर्द




आदमी का दर्द

प्यार का हर एक लफ्ज़ मुन्तज़िर सा हो गया,
रूहे नादानी बड़ी तो वो कलंदर हो गया.
देख दिल्ली आज तेरा ज़ख्म ही व्यापार है,
हमने जो सच्चाई कही तो बस बवंडर हो गया.

जिस्म को कोई यहाँ अब खुदा का घर कहता नहीं,
मन में सबके राम हैं कोई अब कहता नहीं.
देख ले परवरदिगार तेरी कारस्तानियाँ,
आदमी को आदमी अब आदमी कहता नहीं.

इन्साफ क्या? विश्वास क्या? सबकी यहाँ बोली लगी,
दुनिया बनी बाज़ार है हर एक की बोली लगी.
नवरात्रों का मेला यहाँ तो खूब सजधज से मना,
पर देवियों की आज तो हर चौराहे पे है बोली लगी.

कहीं चोरी कहीं डाका कहीं अस्मत से ही खिलवाड़ है,
जिसपे भरोसा किया वो ही यहाँ बेज़ार है.
बात मुझको अब समझ में ये तो आती ही नहीं,
कालिमा से ही भरा क्यों आज ये संसार है.

सोचें ज़रा समझें ज़रा मन को भी टटोलें ज़रा,
जिस राह पे हम बढ़ रहे उसको भी अब तोलें ज़रा.
वासनाएँ मन की सदा यूँ ही हमें भारमाएं ना,
इंसानियत की भावना मन में तो अब रख लें ज़रा.

कल का सूरज फिर नई ईक रोशनी देगा ज़रूर,
इंसान में इंसानियत का फिर जागेगा एक सुरूर.
देश क्या दुनिया को हमपर ऐतबार यूँ ही नहीं,
उनको यकीं है हम नया एक रास्ता देंगे ज़रूर.

© सुशील मिश्र.
07/03/2013




Wednesday, March 6, 2013

हमें भूल जाना न आसां रहेगा





हमें भूल जाना न आसां रहेगा 

मोहब्बत का तराना लबों पर रहेगा,
दिलों का फ़साना तो कायम रहेगा.
बहुत कोशिशें की भुलाने की हमको,
हमें भूल जाना न आसां रहेगा.

गुलों में है खुशबू तो महकेगा मौसम,
अगर तुम नहीं हो तो कैसा हो सावन.
बहुत दूर से जो चली आ रही है,
सुनो मीठी मीठी मुरलिया की वो धुन.

रहेगा हमेशा वो यादों में बसकर,
लगे ऐसा जैसे हो खुद का ही साया.
बहुत अरसे तक हम थे पलकें बिछाए,
नहीं भूलता है जो दिल में समाया.

वो पंछी अंधेरों में भूले जो राहें,
क्यों मंज़र वो देखें तुम्हारी निगाहें.
न जाने हैं वो अब कहाँ आ गये हैं,
खुदा शायद उनको दे दे पनाहें.

चलो हम तो अब बस इबादत करेंगे,
उसूलों की अब बस हिफाज़त करेंगे.
पड़ें चाहे पत्थर ज़माने के अब तो,
न सच्चाई से अब अदावत करेंगे.

© सुशील मिश्र.
06/03/2013

Monday, February 25, 2013

उम्मीद



उम्मीद

अमीरी और हुकूमत (राजा) का,
बड़ा दिलचस्प माँकटेल है ये.
के दोनों मिलकर चमन में,
गरीबी और मुफलिसी (कमजोरी) का कॉकटेल बनाते हैं.
अमीरी ने गरीबी को, बड़ी हिकारत (घृणा) से देखा है.
और हुकूमत ने जनता को भी, कुछ वैसा ही रखा है.
मगर उसकी (ईश्वर) साजिशों से कोई नहीं वाकिफ़,
की कैसे?
मुफलिसी फटे कम्बल में भी, जाड़ा (सर्दी) निकाल देती है,
और हुकूमत अमीरी के रूम हीटर में भी,
कडाके की सर्दी का एहसास करती है.
बहुत बेचैन हो उठता है हुकूमत का दिल,
जब गरीबी मुफलिसी के साये में, फुटपाथ पर चैन से सोती है.

दिलों में दर्द उठना लाज़मी (ज़रूरी) है, ऐ वतन वालों,
कोई रोता नहीं जब लाज लुटती है यहाँ, सड़कों पर बिटिया की,
हाँ, आजकल ट्रेंड में है तो, कैंडल ज़रूर जला आते हैं कुछ.
मगर हाल ही में पता चला कि, हुकूमत में कुछ माँयें ऐसी भी होती हैं,
जो बच्चे के युवराज बनने पर भी रोया करती हैं.
ये आँखें नम नहीं होतीं जब कश्मीर जलता है,
ये आँखें नम नहीं होतीं जब सिक्किम सुलगता है,
ये आँखें नम नहीं होतीं जब दंगा भड़कता है,
ये आँखें नम तभी होगीं जब कोई आतंकी मरता है.
समय अब भी बचा है कुछ तुम्हारे पास वतन वालों,
माँकटेल और कॉकटेल की सियासत को जला डालो.
वो देखो गरीब की आँख में भी उम्मीद टिमटिमाती है,
उसी उम्मीद के सूरज को लेकर,
तरक्की और खुशी का एक आशियाँ बना डालो.

© सुशील मिश्र.
    25/02/2013

Wednesday, February 20, 2013

राह और मंजिल



राह और मंजिल

कंटक हों ना जिन राहों में मुझको उनकी चाह नहीं,
सीधे सादे रस्तों पे चलने की कोई चाह नहीं.
अंधड़, आतप, बारिश, हिमगिरी जब तक ना टकरायें मुझसे,
ईश्वर की सौगंध मुझे उस मंजिल की भी चाह नहीं.


क्या पाना उस मंजिल को जो संघर्षों के बिना मिले,
समझो साजिश है माली की पुष्प बिना यदि पेड़ मिले.
मंजिल का सब खेल है माना, पर राहें तो राहें हैं,
जो राहों को इज़्ज़त देते मंजिल उनको सदा मिले.


मंजिल मंजिल करते हो, बोलो मंजिल में क्या रक्खा,
माना मंजिल पा ही लिया फिर जीवन में है क्या रक्खा.
जब तक आँखों में सपने है, और कदम तुम्हारे राहों पर,
ये समझो तुमने मानवता की सेवा का है व्रत रक्खा.


जैसे हम तुम सपने देखा करते सुखमय जीवन के.
वैसे ही सैनिक, किसान के सपने होते अनुपम से.
एक हमारे प्राण बचाता दूजा देश बचाता है,
मंजिल सबको दिखलाकर वो राह स्वयं बन जाता है.

भारत का कल अब सुदृढ़ हो इसके निमित्त कुछ काम करें,
आओ पथ को मजबूत करें हम चिन्तन मंथन का काम करें.
मंजिल मिलने पर रुकें नहीं अब नये रास्ते खोजें हम,
बलिदानों की परिपाटी से फिर नवयुग का निर्माण करें.


आओ रस्ते गढ़ें जिन्हें सदियों तक की पहचान मिले,
नज़र रहे आकाशों में पर धरती को पूरा मान मिले.
संपदा भुवन की चरणों में हो इसकी मुझको चाह नहीं,
पर पीड़ित से गर अन्याय हुआ तो ब्रह्मा की भी परवाह नहीं.


कंटक हों ना जिन राहों में मुझको उनकी चाह नहीं,
सीधे सादे रस्तों पे चलने की कोई चाह नहीं.
अंधड़, आतप, बारिश, हिमगिरी जब तक ना टकरायें मुझसे,
ईश्वर की सौगंध मुझे उस मंजिल की भी चाह नहीं.

© सुशील मिश्र.
    20/02/2013

Tuesday, February 19, 2013

आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.


आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.

हम सागर की लहरों में तूफ़ान उठाने आये हैं,
आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.

याद करो वो कुरुक्षेत्र वो हल्दी घाटी कि गाथा,
बलिदानों से यहाँ सदा उन्नत रहता अपना माथा,
इतिहासों की विजयी गाथा हम तुम्हे सुनाने आये हैं,
आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.

याद करो वो राजधर्म जो रघुकुल की परिपाटी थी,
मात पिता गुरुवृन्द सभी की सेवकाई (सेवा) की जाती थी.
संस्कारों में निहित मर्म का दर्पण दिखलाने आये हैं,
आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.

भक्ति-भावना, त्याग-समर्पण, दान-धर्म की परिपाटी,
वन्दनीय है कर्ण, हर्ष और शिवि की जन्मदायिनी माटी.
राजधर्म की परिभाषा हम याद दिलाने आये हैं,
आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.

वीर शिवा सा हिम्मत, ज़ज्बा, शौर्य दिखाना होगा,
संख्या नहीं सामर्थ्य का करतब दिखाना होगा.
रण कौशल में कूटनीति का पाठ पढ़ाने आये हैं,
आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.

इतिहासों की विजयी गाथा हम तुम्हे सुनाने आये हैं,
संस्कारों में निहित मर्म का दर्पण दिखलाने आये हैं.
राजधर्म की परिभाषा हम याद दिलाने आये हैं,
रण कौशल में कूटनीति का पाठ पढ़ाने आये हैं.

हम सागर की लहरों में तूफ़ान उठाने आये हैं,
आतंक मचाने वालों को हम आज मिटाने आये हैं.

© सुशील मिश्र.
19/02/2013

Friday, February 15, 2013



ज्ञान का विज्ञान का संधान दो माँ शारदे,
वाणी  सुसंस्कृत बन सके वो ज्ञान दो माँ  शारदे।
संगीत,संस्कृत, संस्कृति का मानसिक संबल मिले,
स्पष्ट सुरभित लेखनी का वरदान दो माँ शारदे।

© सुशील मिश्र।
    15/02/2013