Tuesday, March 19, 2013

समन्दर



समन्दर

समन्दर के बहुत से रूप बिखरे हैं ज़माने में,
फ़साने तुमने भी सुने होंगे उसी गुज़ारे ज़माने में.
मोहब्बत की लगी नें जाने कितने दिल दुखाए हैं,
हमें लग जायेंगी सदियाँ तुम्हें वो वो बताने में.

दिलों के दर्द की परवाह किसको है ज़माने में,
हकीकत और मुगालत की पहँचान किसको है ज़माने में.
उसको बांधकर मज़बूर तुमने किया होगा ज़रूर.
खुशी से कौन करता है यहाँ खिदमत ज़माने में.

बहुत सामान गिरवी क्यों पड़ा है उस खजाने में,
कोई हक़दार उसका क्यों नहीं दिखता ज़माने में.
अभी आते समय देखा बहुत बेबस से चेहरों को,
क्या उनके ही सभी असबाब गिरवी हैं खजाने में.

न जाने राज़ कितने हैं समन्दर के ही सीने में,
न जाने दर्द कितना के गरीबी के पसीने में.
ज़रा एक बार उनकी नाव को लहरों से मिलने दो,
जिन्हें कुछ दम नहीं लगता है लकड़ी के सफीने में.

बहुत अच्छा तुम्हें लगता है ये दौलत दिखाने में,
बहुत अच्छा तुम्हें लगता है ये शोहरत बताने में.
गरीबी भूख लाचारी ने अबतक तुम्हारा घर नहीं देखा,
नहीं तो पसीने छूट जाते हैं यहाँ रोटी जुटाने में.

समन्दर है बहुत गहरा मगर नज़दीक जाने में,
जुबां पर सख्त है पहरा यहाँ सच्चाई बताने में.
जहां के राज की नीति ही हो दलदल में रहने की,
वहाँ पर फर्क ही पड़ता है क्या संसद सजाने में.

समन्दर के बहुत से रूप बिखरे हैं ज़माने में,
फ़साने तुमने भी सुने होंगे उसी गुज़ारे ज़माने में.
मोहब्बत की लगी नें जाने कितने दिल दुखाए हैं,
हमें लग जायेंगी सदियाँ तुम्हें वो वो बताने में.

© सुशील मिश्र.
19/03/2013


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