Friday, November 9, 2012




यूँ तो ऐतबार करना किसी पर भी,
होता है बेहद मुश्किल.
बहुत दर्द होता है,
जब आपका दोस्त ही निकले संगदिल.
फिर भी ये सोचकर की चलो,
रहीं होंगी उसकी भी कुछ मज़बूरियाँ खुद की.
हमने फिर से दोस्ती हाथ बढ़ाया,
क्योंकी वो भी जानता है कि हम हैं बहुत खुशदिल.

© सुशील मिश्र.

Thursday, November 8, 2012





कुछ लोग हैं जो वक्त की रफ्तार में शामिल,
और कुछ लोग हैं जो वक्त को रफ़्तार देते हैं.
इस वक्त और रफ़्तार की जंग में सुशील,
लगाम जिनके हांथों वो ही शहरयार होते हैं.
शहरयार = बादशाह

© सुशील मिश्र.

Wednesday, November 7, 2012




स्वार्थ सिद्धी के भँवर में जग चतुर्दिक फंस रहा है,
स्वयं के हित-चिन्तनों में आज मानस फंस रहा है,
आत्मबल के साथ परहित का संदेशा कौन दे जब,
मार्गदर्शक ही यहाँ अब स्यन्दनों (क्षरण) में फंस रहा है.

© सुशील मिश्र. 

Tuesday, November 6, 2012




संघर्षों में, वीरानों में अंधियारों से लड़ते रहना,
संकल्पों की मनोवृत्ति ले आतप में भी तपते रहना,
सर्द हवा, बारिश, अंगारे मिलकर भी कुछ कर ना पायें,
तुम अंगद के पाँव सरीखे अपनी धुन में रमते रहना.

© सुशील मिश्र.

Friday, November 2, 2012




कुछ हारों में जीत छिपी है, ऐसा चिन्तन क्यों न करें,
जो सत्य प्रचारित नहीं हुआ उसका अभिनन्दन क्यों न करें,
झूठ, फरेब, दर्द, दावानल जब सुरसा सा मुह खोले हैं,
सत्य, अहिंसा, त्याग, समर्पण जैसा वंदन क्यों न करें.

©सुशील मिश्र.

सीमित में असीमित


सीमित में असीमित


सीमित शब्दों के वर्तन से,
जो भी असीमित भाव जगाये.
असीमित भावों के परिचालन से,
जन जन के मन को जो भाये.
जन जन के मन ने जो छेड़े,
संवर्धन के पुष्प सलोने.
संवर्धित उन पुष्पदलों से,
आओ हम जग को महकाएँ.

                      आओ हम जग को महकाएँ,
                      उन संवर्धित पुष्पदलों से.
                      जिन संवर्धित पुष्पदलों का,
                       नाता है जन जन के मन से.
                      जन जन के मन को जो कर दे,
                      असीमित भावों से सुरभित.
                      सुरभित भावों की असीमितता,
                      वर्णित कर दें सीमित शब्दों से.

                                                                           © सुशील मिश्र.

Thursday, November 1, 2012

कुंदन


वही मनुज है जो कंटक पथ पर,
चलकर भी राह बनाए.
और प्रबलता मिलती उसको,
जो पीड़ित के हित मार्ग सुझाए.
कष्ट, आतप, पत्थर, पानी,
संघर्षों कि यही कहानी,
इनमे से जो तपकर आता,
जग में वो कुंदन कहलाता.

 © सुशील मिश्र.